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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
इस दस हजार रुपए के ड्राफ्ट के संबंध में एक पुराना इतिहास है जिसे यहां बता देना जरूरी है। कोई इस पर विश्वास नहीं करता था। सब मजाक ही उड़ाते रहते थे। उस्ताद जी का मूलधन यही था। इसी का उल्लेख करके एकदम संकोचहीन होकर वह लोगों से रुपया उधार मांगा करता था और जल्दी ही ब्याज-मूलधन पूरा चुका देने की सौगंध भी खा लेता था। पांच-सात वर्ष पहले उसके धनवान नाना की जब मृत्यु हुई तो उसे अपने ममेरे भाइयों के साथ सम्पत्ति का एक हिस्सा मिला था। उसे बेचने की बात एक महीने पहले हो गई थी। कलकत्ते के एक एटॉर्नी ने लिखा था कि रुपए दो-एक दिन में मिल जाएंगे।
पत्र समाप्त करके डॉक्टर ने पूछा, “बीस हजार रुपए की बात चली थी न शशि?”
शशि बोले, “दस हजार ही क्या कम हैं? मेरे ममेरे भाई हैं, सम्पत्ति तो अपने ही घर में ही रही।”
डॉक्टर ने भारती से कहा, “इसी तरह का एक पागल ममेरा भाई हम लोगों का भी कोई होता...” कहकर वह हंसने लगे।
शशि को प्रसन्नता नहीं हुई। प्राणपण से यही सिद्ध करने लगा कि सम्पत्ति को बेचे बिना ही इतना रुपया मिल गया। इसलिए कि उसके भाई के समान आदर्श पुरुष संसार में कोई नहीं है।”
भारती मुस्कराकर बोली, “ठीक है शशि बाबू! तुम्हारे उन भैया को देखे बिना ही उनके देव तुल्य चरित्र को मैंने स्वीकार कर लिया।”
शशि बोले, “लेकिन कल मुझे और दस रुपए देने होंगे, तब उस दिन के दस, कल के दस और अपूर्व बाबू के साढे आठ-कुल मिलाकर तीस रुपए परसों-तरसों चुका दूंगा। देने ही पडेंग़े।”
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