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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती हंसने लगी। शशि कहने लगा, “ड्राफ्ट आते ही बैंक में जमा कर दूंगा। जुआरी, शराबी, स्पेथिस्ट - जो भी जी में आता रहा है लोग कहते रहे हैं। लेकिन इस बार दिखा दूंगा। केवल ब्याज से ही गृहस्थी का खर्च चलाऊंगा। उसमें से भी बच जाएगा। डाकघर में एकाउंट खोलना पड़ेगा। घर में रखना ठीक नहीं, पांच-छह साल में ही एक मकान खरीद लूंगा। खरीदना तो पड़ेगा ही, गृहस्थी गर्दन पर आ पड़ी है।”
डॉक्टर भारती के मुंह की ओर ताकते हुए हंसने लगे। लेकिन वह गम्भीर मुंह किए दूसरी ओर देखती रही।
शशि ने कहा, “मैंने शराब छोड़ दी है। शायद आपने सुना हो।”
डॉक्टर बोले, “नहीं।”
“एकदम। नवतारा ने प्रतिज्ञा करा ली।”
डॉक्टर बोले, “शशि, जान पड़ता है अब शीघ्र यहां से हिल नहीं सकोगे?”
शशि बोले, “यह बात कैसे हो सकती है? अब मैं आप लोगों के साथ संबंध न रख पाऊंगा। लाइफ को अब रिस्क में नहीं डाला जा सकता।”
डॉक्टर ने भारती की ओर मुड़कर मुस्कराते हुए कहा, “हमारे उस्ताद जी में और चाहे जो भी दोष हो - लेकिन आंखों का लिहाज इनमें है, ऐसा अपवाद तो बड़े-से-बड़ा शत्रु भी नहीं लगा सकता। यदि सीख सको तो यह विद्या तुम इनसे सीख लो।”
प्रत्युत्तर में शशि का पक्ष लेकर भारती ने बहुत ही भली लड़की की तरह कहा, “लेकिन झूठी आशा देने की अपेक्षा स्पष्ट कह देना ही अच्छा है। यह बात मुझसे नहीं होती। अगर शशि बाबू से मैं यह विद्या सीख पाती तो आज मुझे छुट्टी मिल जाती भैया।”
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