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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


कुछ देर बाद ब्रजेन्द्र अपनी कर्कश आवाज से सबको चकित करता हुआ बोल उठा, “आपके स्वेच्छाचार की हम लोग निंदा करते हैं डॉक्टर! अगर मैं अपूर्व को कभी पा गया तो....!”

डॉक्टर ने वाक्य पूरा करते हुए कहा, “उसकी जान ले लोगे।” यह कहकर उन्होंने सुमित्रा से पूछा, “क्या तुम सभी लोग इस आदमी की बात का समर्थन करते हो?”

सुमित्रा सिर झुकाकर बैठी रही। अन्य किसी ने भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।

कुछ पल चुप रहकर डॉक्टर बोले, “मालूम होता है कि तुम लोग समर्थन करते हो। और इस बीच इस विषय पर तुम लोगों में विचार-विमर्श भी हो चुका है।”

ब्रजेन्द्र बोला, “हां, हो चुका है। और इसका प्रतिकार होना भी हम लोग आवश्यक समझते हैं।”

डॉक्टर बोले, “मैं भी यही समझता हूं। लेकिन इससे पहले एक आवश्यक बात याद दिलाना चाहता हूं। सम्भव है अत्यंत क्रोधावेश में होने के कारण तुम लोगों को यह बात याद न रही हो। अहमद दुर्रानी हम लोगों के समूचे उत्तरी चीन का सेक्रेटरी था। उस जैसा निर्भीक और कार्य-कुशल आदमी हम लोगों के दल में कोई नहीं था। सन् 1910 ईस्वी में जापान द्वारा कोरिया राज्य को हड़प लेने के एक महीने बाद वह किसी रेलवे स्टेशन पर पकड़ा गया। उसे शंघाई में फांसी दी गई। सुमित्रा तुमने दुर्रानी को देखा था?”

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