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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
सुमित्रा ने कहा, “हां।”
डॉक्टर ने कहा, “तब मैं छिता से टूटे हुए दल के पूर्ण गठन में व्यस्त था। मुझे इस बात की खबर तक नहीं मिली कि मेरा एक हाथ टूट गया है। जिस समय अदालत में उसके विरुद्ध विचार का तमाशा हो रहा था, उस समय उसे बचा लेना तनिक भी कठिन नहीं था। हम लोगों के अधिकांश आदमी उन दिनों वहीं रह रहे थे। फिर भी इतनी बड़ी दुर्घटना कैसे हो गई, जानते हो? फैजाबाद के मथुरा दुबे ने बार-बार अत्यंत तुच्छ अविचार कुविचार की शिकायतें कर-करके दल के लोगों के मन को एकदम विषैला बना दिया था। दुर्रानी की मृत्यु से जैसे सभी की जान बच गई। मेरे लौट आने के बाद जब केंटन की मीटिंग में सारी बातें प्रकट हुईं तब दुर्रानी इस लोक में नहीं था। मथुरा दुबे भी टाइफाइड ज्वर से मर चुका था। प्रतिकार के लिए कुछ भी शेष नहीं रह गया था। लेकिन भविष्य के भय से उस रात की गुप्त सभा में दो अत्यंत कठोर कानून पास किए गए थे। कृष्ण अय्यर तुम तो वहां मौजूद थे, बताओ।”
कृष्ण अय्यर का चेहरा सूख गया। वह बोला, “आप जो इशारा कर रहे हैं, मैं उसे समझ नहीं पा रहा डॉक्टर।”
डॉक्टर ने रत्ती भर भी हिचके बिना कहा, “सुनो ब्रजेन्द्र, एक कानून था कि मेरे पीछे किसी काम की आलोचना नहीं हो सकती?”
ब्रजेन्द्र व्यंग्य से बोला, “आलोचना नहीं की जा सकती?”
डॉक्टर बोले, “नहीं, पीछे नहीं की जा सकती। लेकिन की जाती है, मैं यह जानता हूं। इसका कारण यह है कि उस दिन केंटन की सभा में जो लोग मौजूद थे वह दुर्रानी की मृत्यु से जितने उद्विग्न हो उठे थे मैं नहीं हुआ था। इसलिए यह काम होता चला आ रहा है और मैं भी अनदेखा करता चला आ रहा हूं। लेकिन यह भीषण अपराध है।”
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