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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
ब्रजेन्द्र उपेक्षा भरे स्वर में बोला, “उसे भी कह डालिए।”
डॉक्टर बोले, “मेरे विरुद्ध विद्रोह की भावना पैदा करना अत्यंत भयंकर अपराध है। दुर्रानी की मृत्यु के बाद मुझे सावधान हो जाना चाहिए था।”
ब्रजेन्द्र कठोर हो उठा, “सावधान होने की जरूरत दूसरों के लिए भी वैसी ही हो सकती है। यह जरूरत आपके लिए सर्वाधिकार के रूप में नहीं है।” यह कहकर उसने सबकी ओर देखा। लेकिन सब मौन बैठे रहे। किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
काफी देर बाद डॉक्टर ने धीरे-धीरे कहा, “इसकी सजा है - भयानक दंड। सोचा था, जाने से पहले और कुछ करूंगा। लेकिन ब्रजेन्द्र, तुम्हें सब्र नहीं हुआ। दूसरों के प्राण लेने के लिए तुम हमेशा तैयार रहते हो, लेकिन अपने ऊपर आ पड़ने पर कैसा लगता है, जानते हो?”
ब्रजेन्द्र का मुंह काला पड़ गया। जल्दी से स्वयं को संभाल कर बड़े घमंड से बोला, “मैं एनार्किस्ट हूं। रिव्योल्यूशनरी हूं। प्राण मेरे लिए कुछ नहीं हैं। ले भी सकता हूं और दे भी सकता हूं।”
डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा, “तब तो आज रात को देने ही पड़ेंगे, लेकिन बेल्ट निकाल पाने का समय नहीं मिलेगा। ब्रजेन्द्र मेरी आंख है। तुमको मैं पहचानता हूं।” यह कहकर उन्होंने फौरन पिस्तौल वाला हाथ उठा लिया। भारती ने व्याकुल होकर उनके उस हाथ को दबाए रखने की चेष्टा की लेकिन दूसरे हाथ से हटाते हुए बोले, “छि:।”
पलभर में कमरे में जैसे वज्रपात हो गया।
सुमित्रा के होंठ कांपने लगे। बोली, “अपने ही भीतर यह सब क्या हो रहा है, बताइए तो।”
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