|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
तलवलकर अब तक चुप था। उसने धीरे से पूछा, “आपके दल के सभी नियम मुझे मालूम नहीं हैं आपसे मतभेद होने का दंड क्या मृत्यु है? अपूर्व बाबू बच गए हैं। इससे मुझे प्रसन्नता ही हुई है। लेकिन इसमें अन्याय कम नहीं हुआ है यह सत्य कहने के लिए मैं बाध्य हूं।”
कृष्ण अय्यर ने सिर हिलाकर सम्मति दे दी। ब्रजेन्द्र की आवाज में अब उपहासपूर्ण श्रद्धा नहीं थी। अन्य लोगों की सहानुभूति से शक्ति पाकर बोला, “एक आदमी के प्राण जाने अगर जरूरी हैं तो फिर मेरे ही चले जाएं। मैं तैयार हूं।”
सुमित्रा ने कहा, “ट्रेटर के बदले अगर जाने-पहचाने कामरेड के खून की ही जरूरत है तो मैं भी दे सकती हूं डॉक्टर।”
डॉक्टर चुपचाप बैठे रहे। सुमित्रा की बात का उत्तर नहीं दिया।
दो मिनट के बाद मन-ही-मन मुस्कराकर बोले, “यह सब बातें बहुत ही पुराने समय की हैं। उस समय तुम लोग थे ही कहां? इस जाने-पहचाने कामरेड को मैं ही उसी समय से जानता हूं। जाने दो इस बात को। टोकियो के एक होटल में एक दिन सान्याल सेन ने कहा था, “निराशा सहने की शक्ति जिसमें जितनी कम हो उसे चाहिए कि वह रास्ते से उतनी ही दूर हटकर चले। इसलिए मैं सह लूंगा। लेकिन ब्रजेन्द्र मैंने तुम्हें झूठमूठ भय नहीं दिखाया है। मुझे दूसरी जगह जाना पड़ रहा है। डिसिप्लिन टूट जाने से मेरा काम नहीं चलेगा। अगर सुमित्रा तुम्हारे दल में शामिल हो रही है तो - आई विश यू गुडलक। लेकिन तुम मेरा रास्ता छोड़ दो। सुखाया में एक बार अटेम्पड कर चुके हैं। परसों फिर किया, लेकिन इसके बाद नहीं....।”
सुमित्रा ने उद्वेग से चौंककर पूछा, “इन सब बातों का अर्थ क्या अटेम्पड करना होता है।”
डॉक्टर ने इस प्रश्न को अपने कानों तक नहीं पहुंचने दिया। कृष्ण अय्यर ने सिर नीचा कर लिया, लेकिन उत्तर नहीं दिया। डॉक्टर ने जेब से घड़ी निकालकर देखी। फिर भारती का हाथ पकड़कर बोले, “चलो, तुमको डेरे पर पहुंचाकर मैं चला जाऊं। उठो।”
|
|||||

i 








