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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
साधुजी ने एक बार मेरी तरफ, और फिर राजलक्ष्मी की तरफ और उसके बाद मिठाई वाले बरतन की तरफ देखकर हँसते हुए कहा, “गहरी साँस लेने की तो बात ही है भाई, कुछ भी तो नहीं बचा!”
“अभी बहुत है” कहकर राजलक्ष्मी मेरी ओर क्रुद्ध दृष्टि देखकर रह गयी।
ठीक इसी समय रतन पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला, “चिउड़ा तो बहुत मिलता है, पर दूध या दही कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं मिला।”
साधु बेचारे अत्यन्त लज्जित होकर बोले, “आप लोगों के आतिथ्य पर मैंने बड़ा अत्याचार किया है,” यह कहकर वे सहसा उठना ही चाहते थे कि राजलक्ष्मी व्याकुल होकर कहने लगी, “मेरे सर की कसम है लालाजी, अगर उठे। कसम खाती हूँ, मैं सब उठा के फेंक दूँगी।”
साधु क्षण-भर तो विस्मय से शायद यही सोचते रहे कि यह कैसी स्त्री है जो दो घड़ी की जान-पहिचान में ही इतनी गहरी घनिष्ठ हो उठी। राजलक्ष्मी की प्यारी का इतिहास जो नहीं जानता उसके लिए तो यह आश्चर्य की बात है ही।
इसके बाद वह जरा हँसकर बोले, “मैं संन्यासी आदमी ठहरा, खाने-पीने में मुझे कोई हिचक नहीं है; मगर आपको भी कुछ खाना चाहिए। मेरी कसम खाने से तो पेट भर नहीं जायेगा?”
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