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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
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साधुजी खुशी से चले गये। उनकी विहार-व्यथा ने रतन को कैसा सताया, यह उससे नहीं पूछा गया, सम्भवत: वह ऐसी कुछ सांघातिक न होगी। और एक व्यक्ति को मैंने रोते-रोते कमरे में घुसते देखा; अब तीसरा व्यक्ति रह गया मैं। उस आदमी के साथ पूरे चौबीस घण्टे की भी मेरी घनिष्ठता न थी, फिर भी मुझे ऐसा मालूम होने लगा मानो हमारी इस अनारब्ध गृहस्थी में वह एक बड़ा-सा छिद्र कर गया है। और जाते वक्त यह भी न बता गया कि आखिर यह अनिष्ट अपने आप ही ठीक हो जायेगा या स्वयं वही, फिर एक दिन इसी तरह अकस्मात् अपनी दवाओं की भारी पेटी लादे, इसे मरम्मत करने सशरीर आ पहुँचेगा। और मुझे स्वयं कोई भारी उद्वेग हो रहा हो, सो नहीं। नाना कारणों से, और खासकर कुछ दिनों से ज्वर में पड़े-पड़े मेरे शरीर और मन में ऐसा ही एक निस्तेज निरालम्ब भाव आ गया था कि एकमात्र राजलक्ष्मी के हाथ में ही सर्वतोभाव से आत्म-समर्पण करके दुनियादारी की सभी भलाई-बुराइयों से मैंने छुट्टी पा ली थी। लिहाजा, किसी बात के लिए स्वतन्त्र रूप से चिन्ता करने की न मुझे जरूरत थी और न शक्ति ही। फिर भी, मनुष्य के मन की चंचलता को मानो विराम है ही नहीं - बाहर के कमरे में तकिए के सहारे मैं अकेला बैठा था कि न जाने कितनी इखरी-बिखरी चिन्ताएँ मेरे चक्कर लगाने लगीं-सामने के आँगन में प्रकाश की दीप्ति धीरे-धीरे म्लान होकर आसन्न रात्रि के इशारे से मेरे अन्यमनस्क मन को बार-बार चौंका देने लगीं- मालूम होने लगा, इस जीवन में जितनी भी रातें आईं और गयीं हैं, उनके सहित आज की इस अनागत निशा की अपरिज्ञात मूर्ति मानो किसी अदृष्टपूर्ण नारी के अवगुण्ठित मुख की तरह ही रहस्यमय है। फिर भी, इस अपरिचिता की कैसी प्रकृति है और कैसी प्रथा, इस बात को बिना जाने ही इसके अन्त तक पहुँचना ही होगा, मध्य-पथ में इस विषय में कुछ विचार ही नहीं चल सकता। फिर, दूसरे ही क्षण मानो अक्षम चिन्ता की सारी साँकलें टूटकर सब कुछ उलट-पुलट जाने लगा। जब कि मेरे मन की ऐसी हालत थी, तब पास का दरवाजा खोलकर राजलक्ष्मी ने कमरे में प्रवेश किया। उसकी आँखें कुछ-कुछ सुर्ख हो रही थीं और कुछ फूली-सी। धीरे-से मेरे पास बैठकर बोली, “सो गयी थी।”
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