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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “इसमें आश्चर्य क्या है! जिस भार और जिस श्रान्ति को तुम ढोती चली जा रही हो, दूसरा कोई होता तो उससे टूट ही पड़ता- और मैं होता तो दिन-रात में मुझसे कभी आँखें भी न खोली जातीं-कुम्भकर्ण की नींद सो जाता।”
राजलक्ष्मी ने मुसकराते हुए कहा, “लेकिन, कुम्भकर्ण को तो मलेरिया नहीं था। खैर, तुम तो दिन में नहीं सोए?”
मैंने कहा, “नहीं, पर अब नींद आ रही है, जरा सो जाऊँ। कारण कुम्भकर्ण को मलेरिया नहीं था, इस बात का वाल्मीकि ने भी कहीं उल्लेख नहीं किया है।”
उसने घबराकर कहा, सोओगे इतने सिदौ से। माफ करो तुम-फिर क्या बुखार आने में कोई कसर रह जायेगी? यह सब नहीं होने का- अच्छा, जाते वक्त आनन्द क्या तुमसे कुछ कह गया है?”
मैंने पूछा, “तुम किस बात की आशा करती हो?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “यही कि कहाँ-कहाँ जायेगा-अथवा...”
यह 'अथवा' ही असली प्रश्न है। मैंने कहा, “कहाँ-कहाँ जाँयगे, इसका तो एक तरह से आभास दे गये हैं, मगर इस 'अथवा' के बारे में कुछ भी नहीं कह गये। मैं तो उनके वापस आने की कोई खास सम्भावना नहीं देखता।”
राजलक्ष्मी चुप बनी रही, परन्तु मैं अपने कुतूहल को न रोक सका, पूछा, “अच्छा, इस आदमी को क्या तुमने सचमुच पहिचान लिया है जैसे कि मुझे एक दिन पहिचान लिया था?”
उसने मेरे चेहरे की तरफ कुछ देर तक चुपचाप देखकर कहा, “नहीं।”
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