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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “सच बताओ, क्या पहले कभी किसी दिन देखा ही नहीं?” अब की बार राजलक्ष्मी ने मुसकराते हुए कहा, “तुम्हारे सामने में सौगन्ध तो खा नहीं सकती। कभी-कभी मुझसे बड़ी गलती हो जाती है। तब अपरिचित आदमी को देखकर भी मालूम होता है कि कहीं देखा है, उसका चेहरा पहिचाना हुआ-सा मालूम होता है, सिर्फ इतना ही याद नहीं पड़ता कि कहाँ देखा है। आनन्द को भी शायद कभी कहीं देखा हो।”
कुछ देर तक चुपचाप बैठी रहने के बाद धीरे से बोली, “आज आनन्द चला तो गया, पर अगर वह कभी वापस आया तो उसे अपने माँ-बाप के पास जरूर वापस भेजूँगी, यह बात तुमसे निश्चय से कहती हूँ।”
मैंने कहा, “इससे तुम्हारी गरज?”
उसने कहा, “ऐसा लड़का हमेशा बहता फिरेगा, इस बात को सोचते हुए भी मानो मेरी छाती फटने लगती है। अच्छा, तुमने खुद भी तो घर-गृहस्थी छोड़ी थी-संन्यासी होने में क्या सचमुच का कोई आनन्द है?”
मैंने कहा, “मैं सचमुच का संन्यासी हुआ ही नहीं, इसलिए उसके भीतर की सच्ची खबर तुम्हें नहीं दे सकता। अगर किसी दिन वह लौट आवे, तो उसी से पूछना।”
राजलक्ष्मी ने पूछा, “घर रहकर क्या धर्म-लाभ नहीं होता? घर बिना छोड़े क्या भगवान नहीं मिलते?”
प्रश्न सुनकर मैंने हाथ जोड़ के कहा, “दोनों में से किसी के लिए भी व्याकुल नहीं हूँ लक्ष्मी, ऐसे घोरतर प्रश्न तुम मुझसे मत किया करो, इससे मुझे फिर बुखार आ सकता है।”
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