कहानी संग्रह >> जयशंकर प्रसाद की कहानियां जयशंकर प्रसाद की कहानियांजयशंकर प्रसाद
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जयशंकर प्रसाद की सम्पूर्ण कहानियाँ
एक शिला-खण्ड पर बैठे हुए
गुल ने कहा- प्यास लगी है।
बहार
पास के विश्राम-गृह में गई, पान-पात्र भर लाई। गुल पीकर मस्त हो रहा था।
बोला- ”बहार, तुम बड़े वेग से मुझे खींच रही हो; सम्भाल सकोगी? देखो, मैं
गिरा?”
गुल बहार की गोद में सिर
रखकर आँखें बन्द किये पड़ा रहा।
उसने बहार के यौवन की सुगन्ध से घबराकर आँखें खोल दीं। उसके गले में हाथ
डालकर बोला- ”ले चलो, मुझे कहाँ ले चलती हो?”
बहार उस स्वर्ग की
अप्सरा थी। विलासिनी बहार एक तीव्र मदिरा प्याली थी, मकरन्द-भरी वायु का
झकोर आकर उसमें लहर उठा देता है। वह रूप का उर्मिल सरोवर गुल उन्मत्त था।
बहार ने हँसकर पूछा- ”यह स्वर्ग छोड़कर कहाँ चलोगे?”
“कहीं दूसरी जगह, जहाँ हम
हों और तुम।”
“क्यों, यहाँ कोई बाधा
है?”
सरल गुल ने कहा- ”बाधा!
यदि कोई हो? कौन जाने!”
“कौन? मीना?”
“जिसे समझ लो।”
“तो तुम सबकी उपेक्षा
करके मुझे-केवल मुझे ही-नहीं....”
“ऐसा न कहो”- बहार के
मुँह पर हाथ रखते हुए गुल ने कहा।
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